Radha Krishna Holi: होली केवल रंगों का त्योहार नहीं है, बल्कि यह प्रेम, भक्ति और सांस्कृतिक धरोहर से भी जुड़ा हुआ है। यह त्योहार हमें भगवान कृष्ण और राधा के अलौकिक प्रेम की याद दिलाता है, जिसमें रंगों की अहम भूमिका रही। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कृष्ण और राधा (Radha Krishna Holi) की होली से जुड़ी कहानी पुराणों में भी दर्ज है? इस ब्लॉग में हम आपको इस पौराणिक कथा से अवगत कराएंगे और कुछ अनसुनी बातें भी बताएंगे।
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होली का पौराणिक संदर्भ – Radha Krishna Holi
होली का इतिहास अति प्राचीन है और विभिन्न धर्मग्रंथों एवं पुराणों में इसका उल्लेख मिलता है। हिंदू धर्म के अनुसार, होली का त्योहार विभिन्न घटनाओं और पौराणिक कथाओं से जुड़ा हुआ है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण कथा भगवान श्रीकृष्ण और राधा की है, जिन्होंने इस पर्व को एक प्रेममय उत्सव में बदल दिया।
पुराणों में होली का उल्लेख – Radha Krishna Holi
1. नारद पुराण और पद्म पुराण: नारद पुराण और पद्म पुराण में होली के महत्व का उल्लेख मिलता है। इसमें बताया गया है कि यह पर्व न केवल रंगों का खेल है, बल्कि अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक भी है।
2. भागवत पुराण: भागवत पुराण में कृष्ण की बाल लीलाओं का विस्तृत वर्णन मिलता है, जिसमें उन्होंने गोपियों के साथ रासलीला और होली खेली थी। इसी ग्रंथ में राधा और कृष्ण की प्रेमकथा भी दर्शाई गई है।
3. विष्णु पुराण: इसमें प्रह्लाद और होलिका की कथा आती है, जो यह दर्शाती है कि यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक भी है।
कृष्ण और राधा की होली (Radha Krishna Holi): जब प्रेम रंगों में घुल गया

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा के कारागार में हुआ था, लेकिन उनका पालन-पोषण गोकुल और वृंदावन में हुआ। कहा जाता है कि बालकृष्ण सांवले थे और वे अक्सर अपनी माता यशोदा से शिकायत करते थे कि राधा और अन्य गोपियां इतनी गोरी क्यों हैं। इस पर माता यशोदा ने हंसकर सुझाव दिया कि वे राधा को अपने रंग में रंग सकते हैं। यही से होली का यह प्रेमपूर्ण सिलसिला शुरू हुआ।
1. कृष्ण और राधा का प्रेम: क्यों थी रंगों की ज़रूरत?
कृष्ण की चिंता: “मैं सांवला, राधा इतनी गोरी क्यों?”
भगवान श्रीकृष्ण बचपन से ही अपनी माता यशोदा से यह सवाल पूछते थे –
“माँ, मैं इतना सांवला क्यों हूँ और राधा इतनी गोरी क्यों?”
माता यशोदा हँसकर कहतीं –
“अगर तुम्हें यह चिंता है, तो राधा को रंग से रंग दो, फिर देखो, वह तुम्हारे जैसी ही लगेंगी!”
यही बात श्रीकृष्ण के मन में बस गई और उन्होंने राधा और उनकी सखियों को रंगने की योजना बना डाली।
राधा-कृष्ण की होली का वृंदावन से संबंध – Radha Krishna Holi
एक दिन नंदगांव के कृष्ण अपने सखाओं के साथ बरसाना पहुंचे, जहां राधा अपनी सखियों के साथ होली खेल रही थीं। कृष्ण ने छुपकर उन पर रंग डाल दिया और यह देखकर राधा नाराज हो गईं। लेकिन धीरे-धीरे यह रंगों का खेल प्रेम में बदल गया और कृष्ण ने राधा को अपने रंग में रंग लिया।
2. जब कृष्ण ने राधा को रंग लगाने के लिए बुलाया!

कैसे शुरू हुई होली की यह परंपरा?
फाल्गुन मास का समय था, जब पूरी ब्रजभूमि वसंत ऋतु के आगमन का स्वागत कर रही थी। वृंदावन, बरसाना और गोकुल फूलों की सुगंध से महक रहे थे।
श्रीकृष्ण ने अपने मित्रों के साथ मिलकर राधा और उनकी सखियों को होली खेलने के लिए बुलाया। लेकिन राधा और उनकी सखियाँ कृष्ण की शरारतों को पहले से जानती थीं, इसलिए वे झिझक रही थीं।
राधा की झिझक और कृष्ण की नटखट शरारत
जब राधा ने कृष्ण का बुलावा स्वीकार नहीं किया, तो कृष्ण ने खुद ही अपनी पिचकारी उठाई और नंदगांव से बरसाना पहुँच गए। जैसे ही राधा अपनी सखियों के साथ वहां आईं, कृष्ण ने उन पर रंग डाल दिया!
राधा पहले तो चौंक गईं, लेकिन जब कृष्ण ने हँसते हुए कहा –
“अब तो हम दोनों एक जैसे दिखते हैं, अब तो होली खेलोगी?”
तो राधा भी हँस पड़ीं और फिर उन्होंने भी कृष्ण पर रंग डाल दिया।
बरसाने की लट्ठमार होली: एक अनोखी परंपरा – Radha Krishna Holi
बरसाने की लट्ठमार होली दुनिया भर में प्रसिद्ध है और इसकी जड़ें भी राधा-कृष्ण (Radha Krishna) की कहानी में हैं। कहा जाता है कि कृष्ण और उनके सखा जब नंदगांव से बरसाने में होली खेलने आते थे, तो राधा और उनकी सखियां उन्हें लाठियों से मारने का खेल खेलती थीं। यही कारण है कि आज भी बरसाने की होली ‘लट्ठमार होली’ के रूप में प्रसिद्ध है।
इस परंपरा में महिलाएं पुरुषों को लाठियों से मारने का नाटक करती हैं और पुरुष इसे ढाल लेकर रोकने का प्रयास करते हैं। इस दौरान होली के लोकगीत गाए जाते हैं और मस्ती का माहौल बना रहता है।
वृंदावन की फूलों की होली: रंगों की जगह खुशबू का त्योहार – Radha Krishna Holi

वृंदावन में एक और अनोखी परंपरा है – फूलों की होली। यह होली फूलों की वर्षा के साथ मनाई जाती है, जिसमें श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण और राधा पर रंगों की जगह फूल बरसाते हैं। यह होली विशेष रूप से बांके बिहारी मंदिर में मनाई जाती है। इस दौरान पूरा मंदिर रंग-बिरंगे फूलों से भर जाता है और भजन-कीर्तन का आयोजन होता है।
कृष्ण की 40 दिवसीय होली: एक विशेष परंपरा – Radha Krishna Holi
माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण अपने सखाओं और गोपियों के साथ 40 दिनों तक होली खेलते थे। यही कारण है कि वृंदावन और मथुरा में होली का उत्सव बहुत पहले से शुरू हो जाता है और कई दिनों तक चलता है।
इस दौरान विभिन्न मंदिरों और स्थानों पर होली से जुड़े आयोजन किए जाते हैं।
होली से जुड़े कुछ रोचक तथ्य
- धार्मिक महत्त्व: होली केवल रंगों और प्रेम का उत्सव नहीं, बल्कि यह भगवान विष्णु के भक्त प्रह्लाद और होलिका की पौराणिक कथा से भी जुड़ा हुआ है।
- रंगों का वैज्ञानिक महत्त्व: होली वसंत ऋतु में आती है, जब मौसम बदलता है और कई बीमारियां फैलने लगती हैं। रंगों और अबीर-गुलाल में मौजूद प्राकृतिक तत्व शरीर के लिए लाभकारी होते हैं।
- दुनिया भर में प्रसिद्ध: केवल भारत में ही नहीं, बल्कि नेपाल, बांग्लादेश, मॉरीशस, फिजी, अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया में भी होली धूमधाम से मनाई जाती है।
- साहित्य और संगीत में होली: संत सूरदास, रसखान, मीरा बाई और अन्य भक्त कवियों ने होली के महत्व को अपने भजनों में दर्शाया है।
FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)
Q1: होली का सबसे पुराना उल्लेख कहाँ मिलता है?
होली का सबसे पुराना उल्लेख पुराणों, महाभारत और काव्य ग्रंथों में मिलता है।
Q2: ब्रज में होली कितने दिन तक मनाई जाती है?
ब्रज में होली करीब 10-15 दिनों तक मनाई जाती है, जिसमें अलग-अलग प्रकार की होलियाँ खेली जाती हैं।
Q3: लट्ठमार होली क्यों खेली जाती है?
लट्ठमार होली राधा और कृष्ण की रंग भरी होली की परंपरा से जुड़ी है, जिसमें राधा की सखियाँ कृष्ण और उनके सखाओं पर लाठियाँ बरसाती हैं।
Q4: वृंदावन की होली खास क्यों होती है?
- यहाँ फूलों की होली, लट्ठमार होली और रंगों की होली का विशेष आयोजन होता है।
- दुनिया भर से श्रद्धालु इस पावन अवसर पर वृंदावन और मथुरा आते हैं।
निष्कर्ष
होली केवल रंगों और मस्ती का त्योहार नहीं है, बल्कि यह प्रेम, भक्ति और उल्लास का प्रतीक भी है। कृष्ण और राधा (Radha Krishna) की होली ने इस त्योहार को विशेष बना दिया और आज भी हम उनकी प्रेमगाथा को रंगों के माध्यम से जीवंत करते हैं। अगर आपको यह ब्लॉग पसंद आया हो, तो इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ जरूर शेयर करें और होली के इस पावन पर्व को और भी खास बनाएं।
“रंग बरसे, भीगे चुनर वाली… बुरा न मानो होली है!”
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